"सामाजिक न्याय की अधूरी लड़ाई को पूरा करने का समय आ गया है" : अनीस मंसूरी
कर्पूरी ठाकुर जी की पुण्यतिथि पर पसमांदा मुस्लिम समाज ने राजधानी लखनऊ से भरी हुंकार
लखनऊ। "सामाजिक न्याय केवल नारों और प्रतीकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि जननायक कर्पूरी ठाकुर को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है, तो उनके 'कर्पूरी फॉर्मूला' को व्यवहार में उतारते हुए पसमांदा समाज को सत्ता और संसाधनों में उनकी आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी देनी होगी। अब सामाजिक न्याय की अधूरी लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुँचाने का समय आ गया है।"
यह ओजस्वी आह्वान पसमांदा मुस्लिम समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनीस मंसूरी ने लालबाग स्थित प्रदेश कार्यालय में आयोजित विचार गोष्ठी के दौरान किया। अवसर था बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि का, जिसे पसमांदा समाज ने महज एक औपचारिक कार्यक्रम न रखकर 'प्रतिनिधित्व और भागीदारी' के एक बड़े विमर्श में बदल दिया।
अनीस मंसूरी ने अपने संबोधन में बताया कि 1978 के 'कर्पूरी फॉर्मूला' की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा कि उस ऐतिहासिक निर्णय ने अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBC) की पहचान कर उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ा था, जिसका लाभ मुस्लिम समाज के पिछड़े तबकों को भी मिला। लेकिन आज भी पसमांदा मुस्लिम समाज शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में उपेक्षित है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों आबादी के अनुपात में भागीदारी की बात होने पर पसमांदा समाज को हाशिये पर धकेल दिया जाता है?
गोष्ठी में उपस्थित वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि पसमांदा समाज आर्थिक तंगी, शैक्षिक पिछड़ेपन और सामाजिक उपेक्षा की त्रिस्तरीय चुनौती का सामना कर रहा है। श्री मंसूरी ने मांग की कि धर्म के बजाय सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को आधार मानकर नीतियों की समीक्षा की जाए और अत्यंत पिछड़े वर्गों के भीतर पसमांदा मुसलमानों की वास्तविक स्थिति का आकलन कर ठोस कदम उठाए जाएं। कार्यक्रम के अंत में कर्पूरी ठाकुर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उपस्थित कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने संकल्प लिया कि वे सामाजिक न्याय और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व की इस मांग को हर राजनीतिक मंच तक लेकर जाएंगे।




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